ग़ुस्सा एक सबसे ज़्यादा तेज़ी से फैलने वाले जज़्बात हैं।
ग़ुस्से वाले शख़्स को कभी भी ग़ुस्से से जवाब न दें, चाहे वो इसका मुस्तहिक़ ही क्यों न हो। उसके ग़ुस्से को इजाज़त न दें कि वो आपका ग़ुस्सा बन जाए।
ग़ुस्सा वो वाहिद जज़्बा है, जो दूसरे के दिल में जलता है और आपके दिल को भी झुलसा सकता है, अगर आपने उसे अपनाया।
कभी किसी ग़ुस्से वाले शख़्स को ग़ुस्से से जवाब न दें, चाहे वो कितना ही तल्ख़ हो। चाहे उसने आपके वक़ार को चैलेंज किया हो। क्योंकि याद रखें... वो अपने अंदर की तकलीफ़ चीख़ रहा है। आप पर नहीं, ख़ुद पर।
नफ़्सियाती तौर पर, ग़ुस्सा अक्सर एक "दिफ़ाई मेकैनिज़्म" होता है। इसके पीछे कोई दुःख, बेबसी, या महरूमी छुपी होती है। जब हम ग़ुस्से से जवाब देते हैं तो हम उस ज़ख़्म को और गहरा कर देते हैं और ख़ुद भी उसमें गिर जाते हैं।
जज़्बाती तौर पर जब आप ख़ामोशी से, नर्मी से जवाब देते हैं तो आप सिर्फ़ दूसरा शख़्स ही नहीं, ख़ुद अपनी रूह को भी बचाते हैं। आपका सुकून आपकी ताक़त है।
ख़ुद से कहें:
"मैं किसी और के ज़हर को अपनी सांस नहीं बनने दूँगा। मैं अपनी अमन-पसंदी को अपनी हिफ़ाज़त बनाऊँगा।"
ग़ुस्से को जज़्ब कर लेना कमज़ोरी नहीं, बल्कि दिल की वो ताक़त है... जो सिर्फ़ बड़े ज़र्फ़ वाले लोग रखते हैं।
क्योंकि रौशनी वही है... जो अंधेरे को छू कर भी जलती नहीं, बस चमकती है।


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